पाठ्यक्रम: GS1/ जलवायु विज्ञान
संदर्भ
- विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने संकेत दिया है कि विकसित हो रही अल नीनो घटना 2026 के अंत तक तीव्र हो सकती है, जिसका प्रभाव 2027 तक भी जारी रहने की संभावना है।
अल नीनो के बारे में
- अल नीनो मध्य-पूर्वी विषुवतीय प्रशांत महासागर में समुद्री जल के गर्म होने की घटना है, जो प्रत्येक कुछ वर्षों के अंतराल पर घटित होती है।
- अल नीनो के दौरान, विषुवतीय प्रशांत महासागर की सतह का तापमान बढ़ जाता है तथा व्यापारिक पवनें कमजोर हो जाती हैं। व्यापारिक पवनें वे पूर्व से पश्चिम की ओर चलने वाली पवने हैं, जो विषुवत रेखा के निकट प्रवाहित होती हैं।
- यह प्रशांत महासागर क्षेत्र में होने वाली महासागर-वायुमंडल की व्यापक अंतःक्रिया के तीन चरणों में से एक है, जो विश्वभर के मौसम प्रतिरूपों को प्रभावित करती है।
- इस अंतःक्रिया को अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) कहा जाता है। इसके तीन चरण हैं—उष्ण चरण (अल नीनो), तटस्थ चरण तथा शीत चरण (ला नीना)।
- गॉडज़िला अल नीनो एक ऐसा शब्द है, जिसका उपयोग असाधारण रूप से शक्तिशाली अल नीनो घटना के लिए किया जाता है। यह घटना प्रशांत महासागर के तापमान में असामान्य रूप से अधिक वृद्धि से संबंधित होती है।

वैज्ञानिक अल नीनो की तीव्रता का मापन कैसे करते हैं?
- समुद्री सतह के तापमान में विसंगतियाँ : वैज्ञानिक विषुवतीय प्रशांत महासागर के विशिष्ट क्षेत्रों, विशेषकर नीनो 3.4 क्षेत्र, में समुद्री सतह के तापमान की निगरानी करते हैं तथा उनकी तुलना दीर्घकालिक औसत तापमान से करते हैं।
- सापेक्ष महासागरीय नीनो सूचकांक (RONI): यह नीनो 3.4 क्षेत्र में तापमान की विसंगति को उष्णकटिबंधीय महासागरों के औसत तापमान में वृद्धि के सापेक्ष मापता है।
- यदि तीन महीने की अवधि में RONI का औसत मान 0.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाता है, तो अल नीनो की घोषणा की जाती है। इसके विपरीत, यदि RONI का औसत मान −0.5 डिग्री सेल्सियस से कम होता है, तो ला नीना की घोषणा की जाती है।
- अवधि एवं वायुमंडलीय परिस्थितियाँ : वैज्ञानिक यह भी आकलन करते हैं कि तापमान संबंधी विसंगतियाँ कितने समय तक बनी रहती हैं तथा क्या उनके साथ वायुमंडलीय परिसंचरण में विशिष्ट परिवर्तन भी होते हैं।
- तापमान की सकारात्मक विसंगति जितनी अधिक होती है, अल नीनो का संकेत उतना ही प्रबल होता है।
भारत पर प्रभाव
- मानसून का कमजोर होना: अल नीनो दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर कर सकता है, जो भारत की वार्षिक वर्षा में लगभग 70% का योगदान देता है।
- प्रदत्त रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 का मानसून दीर्घावधि औसत (LPA) के 87% पर समाप्त हुआ।
- कृषि संबंधी हानि: कम वर्षा और बढ़ता तापमान फसलों की उपज को कम करते हैं, सिंचाई की आवश्यकता बढ़ाते हैं तथा कृषि उत्पादन को प्रभावित करते हैं।
- जल संकट: कम वर्षा और वाष्पीकरण में वृद्धि के कारण जलाशयों तथा भूजल के स्तर में गिरावट आती है, जिससे पेयजल एवं कृषि के लिए उपलब्ध जल की मात्रा कम हो जाती है।
- खाद्य मुद्रास्फीति: फसल उत्पादन में कमी से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ जाती हैं, जिसका असमानुपातिक रूप से अधिक प्रभाव निम्न-आय वाले परिवारों पर पड़ता है।
- सामान्य से अधिक उष्ण सर्दियाँ: शीतकालीन तापमान में सामान्य से अधिक वृद्धि रबी फसलों, विशेषकर गेहूँ, को प्रभावित करती है। इससे तापमान के प्रति संवेदनशील विकास अवस्थाओं में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है।
वैश्विक प्रभाव
- उत्तरी गोलार्ध में, दक्षिणी यूरोप और अफ्रीका के कुछ भागों, अरब प्रायद्वीप, भारतीय उपमहाद्वीप तथा पूर्वी एशिया में सामान्य से अधिक तापमान रहने की संभावना है।
- अरब प्रायद्वीप, मध्य एवं पूर्वी एशिया, तटीय दक्षिण-पूर्व एशिया तथा उत्तरी अमेरिका में सामान्य से अधिक वर्षा होने की संभावना है।
- दक्षिणी गोलार्ध में, अफ्रीका के विभिन्न क्षेत्रों, विशेषकर विषुवतीय क्षेत्रों और ग्रेटर हॉर्न ऑफ अफ्रीका, के साथ-साथ दक्षिण अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया में सामान्य से अधिक तापमान रहने की संभावना है।
- दक्षिणी गोलार्ध के अनेक क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा होने की आशंका है। इसका प्रभाव विशेष रूप से दक्षिणी अफ्रीका, दक्षिणी मध्य अमेरिका तथा कैरेबियाई क्षेत्र में देखने को मिल सकता है।
आगे की राह
- भारत को जलवायु पूर्वानुमान प्रणालियों तथा प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को सुदृढ़ करना चाहिए।
- जल संरक्षण तकनीकों के साथ जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- शहरी नियोजन में हरित अवसंरचना तथा ताप शमन तकनीकों को शामिल किया जाना चाहिए।
- लोगों में अत्यधिक गर्मी से उत्पन्न स्वास्थ्य जोखिमों तथा आपदा संबंधी तैयारियों के प्रति जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए।
निष्कर्ष
- अत्यधिक शक्तिशाली अल नीनो वर्तमान जलवायु एवं आर्थिक कमजोरियों को अधिक बढ़ा सकता है। इसका प्रभाव विशेष रूप से उन देशों पर अधिक पड़ सकता है, जहाँ कृषि मुख्यतः वर्षा पर निर्भर करती है।
- इसके संभावित प्रभावों को कम करने के लिए जलवायु-अनुकूल कृषि, प्रभावी जल प्रबंधन, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सुदृढ़ करना आवश्यक होगा।
स्रोत: IE
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संक्षिप्त समाचार 24-10-2026
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